रविवार, 9 फ़रवरी 2014

धुंआं -धुंआ जिंदगी

फिल्मों और धारावाहिक के दौरान धूम्रपान और शराब के सीन आने पर लिखा होता है ...धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है इससे कैंसर हो सकता है । शराब, सिगरेट और गुटखा के पैकेट पर भी चेतावनी लिखी होती है। केंद्र और राज्य सरकार भी इसकी पांबदी और इससे बचने के लिए हर तरह के प्रचार-प्रसार, विज्ञापन पर लाखों खर्च कर रही है। ......पर ये तो वही कहावत हुई शायद आपने भी सुनी हो....चोर से कहना चोरी कर..और साहूकार से कहना जागते रहे.....पहली बात.... लोग खुद इसके सदियों से आदि हो चुके हैं वो इसके नशे से बचना नहीं चाहते या बच नहीं सकते....दूसरी बात बिक्री से होने वाला फायदा आर्थिक स्तर पर बड़ी भूमिका अदा करता है.....तो फिर रुके कैसे...सीधी सी बात है इसका उत्पादन बंद कर दें....ना उत्पादन होगा ना बिक्री होगी..ना बीमारी होगी...या फिर लोग इसको त्याग दें....ना लोग खाएंगे ...ना बिक्री होगी ना उत्पादन होगा....पर ये दोनो ही बातें नहीं होंगी.....हम अपनी मेहनत की कमाई से नशे की चीजें खरीदेंगे..खाएंगे और फिर बीमार होकर डॉक्टर को फीस देंगे और दवाई के लिए मोटी रकम भी खर्च करेंगे और तकलीफ भी उठाएंगे...कितना बेबस और कमजोर होता है इंसान ....कभी मौका मिले तो देखिएगा शराब की दुकानों पर कितनी शिद्दत से ध्यान लगाए बोतल का इंतजार करते हैं। सिगरेट के लहराते धुएं में कितनी तल्लीनता से अपने गमों को उड़ाते हैं बिचारे...और गुटखा मुंह में भरकर शायद बुरा बोलने से बचने की कोशिश करते हैं....पूछो तो कहते है अरे पियो तो जानो ....कितना सुकून है इसमें...पर मुझे हमेशा से यही बात सालती है कि कोई भी नशा क्या जीवन के नशे से बड़ा हो सकता है...या फिर कोई कैसे जानबूझ कर कोई ऐसी चीज खा पी सकता है जो शरीर में जाकर नुकसान पहुंचाता है....प्रकृति में इतनी अच्छी और स्वादिष्ट चीजें है जो एक जीवन में हम पूरी तरह खा भी नहीं पाते फिर इसकी जरूरत क्यों पड़ती है....थोड़ा सा सोचिए...जिंदगी बेहद कीमती है इसकी अहमियत जाननी हो तो एक बार अस्पताल जाकर जरूर देखें शरीर में बीमारी हो तो कितनी तकलीफ मिलती है खुद को भी और अपने अपनों को भी तो फिर क्यों ये राह चुने जिसका अंत बुरा है.....

मंगलवार, 26 जून 2012

दिल्ली की दुनिया

दिल्ली का सफर तो कई बार किया। कभी कहीं आते-जाते दिल्ली को पार करती ट्रेन से दिल्ली को बड़ी कौतूहल से देखा भी। हर बार एक आश्चर्य और बड़ेपन के अहसास से मन भर जाता था। दिल्ली में रहने वाले लोग छोटे शहरों के लोगों के लिए किसी दूसरी दुनिया में रहने वाले जैसे होते हैं। भारत की राजधानी दिल्ली जिसका सदियों का गौरवशाली इतिहास है,तो तेजी से बढ़ते मैट्रो कल्चर की हर आधुनिक बातों से लबरेज है। दिल्ली का आकर्षण मुंबई, कोलकाता और चेन्नई से हट के है। बुद्धिजीवी वर्ग, पढ़ाई का माहौल, कला की बानगी तो राजनीति का गढ़ दिल्ली सभी के लिए आकाश के सितारे जैसा है जिसे शायद हर कोई पाना चाहता है।आगे बढ़ने की चाह जिसमे हो वो एक बार जरूर दिल्ली की गति के साथ कदम ताल जरूर मिलाना चाहेगा। बस यही चाह मौका मिलते ही दिल्ली के लिए मेरा भी मन में मचल उठा। मन में आत्मविश्वास लिए पहुंच गई दिल्ली। दिल्ली को अपनाने की जद्दोजहद में दिल्ली को करीब से देखने का मौका मिला। साफ-सुथरी चमचमाती सड़के, सड़कों के ऊपर दौड़ती मेट्रो,रंग-बिरंगी बसें और ऐतिहासिक ईमारतों की गरिमा आपको खास होने का अहसास कराती हैं। यहां लोगों के पास किसी के लिए कोई वक्त नहीं, मेल जोल बढ़ाने का कोई रिवाज नहीं, काम निकालने के अलावा दूसरा कोई मकसद नहीं किसी से जुड़ने का। हर कोई जैसे दूसरी जगह से आने वाले लोगों को कमतरी का अहसास कराने में जुटा है। किसी पे आपने यकीन करने की गलती की तो आपके साथ क्या होगा आप खुद नहीं जानते। ऐसी भूल-भुलैया दिल्ली में अगर आपमे जज्बा नहीं, जूझने की हिम्मत नहीं तो कब आप खो जाएंगे कोई नहीं  जानता। दिल्ली के बाहर से यहां आकर पढ़ने वाले, काम करने वाले लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। खासकर युवा वर्ग इसे करियर के लिहाज से ज्यादा पसंद करता है। उच्च शिक्षा हो, कोचिंग हो या नौकरी की चाह में युवा खिंचे चले आते हैं। तो यहां हर बात को प्रोफेशनल का जामा पहना कर लूटने वालों की कमी भी नहीं है। पेइंग गेस्ट का कारोबार शायद आईपीएस बनने से ज्यादा फायदेमंद है। हर घर में खुद के लिए जगह कम हो तो चलेगा पर एक कमरा भी है तो आप उससे बेहद कमा सकते हैं। कुछ भी खाना बना दें उसकी कई गुनी कीमत आप कमा सकते हैं। और हां अगर आप संवेदना, सादगी, अपनापन,ईमानदारी जैसी खूबियां रखते हैं तो इसे आप छुपा लें वरना आउटडेटेड कहलाने का खतरा भी यहां है। यहां तो भई जो दिखता है वो बिकता है की परंपरा है अगर आपने बाहरी सजावट अच्छी की है,अंग्रेजी के बोल आपके होठों पर सजे हैं, सामने वाले को बेवकूफ बनाने की कला जानते हैं तभी आप दिल्ली की तरफ उम्मीद से देखें वरना ये दिल्ली आपका दिल निकाल कर आपको बेदिल और बेदखल करने के लिए तैयार है। सोच समझ कर चलें दिल्ली की राह.. ये राह आसान नहीं...गालिब ने शेर मोहब्बत की जगह दिल्ली पर लिखा होता तो शायद सही होता......ये दिल्ली नहीं आसां बस इतना समझ लीजे,इक आग का दरिया है और डूब के जाना है....

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

धमाके में जिंदगी
फिर धमाका हुआ  , अफरा-तफरी मची
लोगों की भीड़ जुटी, हल्ला मचा
सारे टीवी स्क्रिन ब्रेकिंग प्वाइंट से भर गए
लोग देखने, सुनने के लिए बेताब होगए
थोड़ी देर में घटना स्थल की तस्वीरें आगईं
और सभी की जुबान पर हाय..हाय के शब्द तैर गए.....
पर संवेदना कितनी थी ये तो पता नहीं
क्योंकि लोग एक पल ठहर कर चल पड़े आगे ....जैसे ट्रेन के छूटते ही प्लेटफार्म छूट जाता है....एक दिन पहले ट्रेन हादसे में जाने गईं ...मलबा हटा नहीं और दूसरी जगह धमाके में ढ़ेर हो गए लोग।
हिन्दी फिल्मों की तरह ही सब खत्म होने के बाद पहुंची पुलिस
कुछ नेताओं नें घटना स्थल का दौरा करके जिम्मेदारी निभाई 
 और सुरक्षा पर कसीदे भी कढ़े...
और पुलिस जांच में जुटी कह कर हादसे की कहानी समाप्त...
ये है हिंदुस्तान जिसे फिरंगियों से छुड़ाने के लिए
लोगों नें अपनी जाने दी..वो जिंदा होते तो जरूर शर्माते,
अब तो देश को लूटने और बरबाद करने वालों की फौज तैयार है
इसीलिए संवेदना भी किराए की हो गई है...
हर दिन हादसे होते हैं, लोग मरते हैं,
कभी नक्सलवादी, कभी आतंकवादी
कभी भ्रस्टाचार के खिलाफ अनशन में तो,
कभी लापरवाही की भेंट चढ़ रहे हैं लोग..
होना कुछ नहीं है, वही ढाक के तीन पात...
लोग खुद आदि हो चुके हैं जंगलराज के
उन्हें मालूम है ये भारत है यहां
ना न्याय मिलना है ना सजा,
क्योंकि गरीब लोग ही मरते हैं
जब तक कसाब जैसे लोग देश में पलेंगें
तो उनके जन्मदिन में धमाके के केट कटेंगे ही
न्याय तो तब मिलेगा जब कोई
कोई कद्दावर आहत होगा ...
उसकी भी गारंटी नहीं है...
न्याय मिलेगा या जेल में पलेगा ?

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

ये कैसा प्यार ?

                                                                                                          
कुछ बातों पर यकीन करना चाहूं तो भी नहीं कर पाती...कुछ लोगों के बदलाव को देखूं तो भी यकीन नहीं होता...सोचती हूं क्या वाकई दुनिया बदल गई...क्या रिश्तों के मायने अब नया रूप अख्तियार कर चुके हैं...अब तक बॉलीवुड और टीवी सीरियल में इस तरह की स्टोरी देखकर लगता था कि क्या ऐसा दुनिया में होता होगा...फिर सोचा ग्लैमरस लाइफ के लिए ये बात मायने नहीं रखती लोग कपड़ों की तरह रिश्ते बदलते है...और टीवी सीरियल में तो लोगों के मनोरंजन या टीआरपी के चक्कर में काल्पनिक तौर पर बनाया जाता होगा ...पर अब तो अपने आस-पास के लोगों को देखकर लगता है कि वाकई फिल्म वालों को भी स्टोरी हमारे बीच के लोग ही देतें हैं...आज 'प्यार' शब्द पर ही बात कर लें क्योंकि सारे रिश्ते और शब्दों पर बात करें तो उलझ सी जायेंगी...'प्यार' ये शब्द सुनते ही मन एक सुंदर सी भावना के आसपास घूमने लगता है...जिसमें त्याग, समर्पण, ईमानदारी जैसे भावों का समावेश हुआ करता था...प्यार का नाम सुनते ही याद आते थे वो कुछ लोग जो जाति-धर्म,ऊंच-नीच,अमीरी-गरीबी से परे एक दूसरे की परवाह के लिए अपनी जान तक दे चुके हैं...शायद सब जानते हैं हीर-रांझा,शीरी-फरहाद,लैला-मजनू को...पर आज के प्रेमी शायद इनकों बेवकूफ कहें तो चौंकियेगा मत...क्योंकि अब तो लोग प्यार को जीत-हार और जिंदगी के लिए सुख बटोरने का माध्यम बना चुके हैं,हीर ना मिली तो क्या दुनिया में हीर की कमी है ,रांझा न मिला तो क्या.. अरे उससे अच्छा रांझा भी आस-पास ही मिल जाएगा...रही बात कसमे-वादे की जो साथ निभाने के लिए हर प्रेमी एक दूसरे से करते हैं..साथ में सारी हदे फिर वो चाहे मन की हो या तन की पार करने के बाद भी उसे सामान्य करार देकर आगे निकल पड़ते हैं... जैसे वो किसी नाटक के संवाद से ज्यादा कुछ भी नहीं था..जो एक नाटक खत्म होने के साथ ही खत्म हो जाता है....और जिंदगी में नए प्रेमी-प्रेमिका के बदलते ही बदल जाता हैं...इतना तो फिर भी ठीक है साहब पर आज तो एक साथ कई लोगों से प्यार निभाते देखा जाता है और फिर जो बेहतर मिलता है अपनी जरूरतों के हिसाब से उसे बड़े नाटकीय अंदाज में जीवन साथी भी चुन लिय़ा जाता है...तमाम पाकिजगी और आंखों में शर्मों हया की दुहाई के साथ...और ना तो प्रेमी को फर्क पड़ता है धोखा देने का ना ही प्रेमिका को फर्क पड़ता नए के साथ हो लेने का...क्या कहिएगा इसे बॉलीबुड की फिल्मी स्टोरी..जी नहीं ये हकीकत है आज के समय की.. जिसकी झलक अब छोटे-बड़े शहरों में आसानी से देखी जा सकती है...आज के समय में रिश्तोंकी गरिमा,गंभीरता,ईमानदारी,संघर्ष की बात करिए तो जो युवा आपके पास होंगे वो जरूर आपको पुराने जमाने का कह कर आपको आउटडेटेड कहने से नहीं चूकेंगे...और आपको खुद शर्म आएगी अपनी सादगी और ईमानदारी पर....और मुश्किल तो यही है कि सुख की परिभाषा भी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती देख पाएंगे आप..मेरी सोच में तो ये प्यार नहीं आप क्या सोचते हैं इस बारे में.....ये बदलाव कहां ले जाएगा दुनिया को....रिश्तों कों...या अब यही पहचान होगी रिश्तों की जिससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा...झूठ ,फरेब,चापलूसी.धोखा,जीत हार का गणित,भ्रस्ट आचरण,छल-कपट ही शायद इस युग की पहचान मानी जायेगी..क्योंकि हर युग की अपनी विशेषता होती है ,लोगों के जीवन मूल्य,नैतिक मूल्य होते हैं..तो यही समझें कि वाकई कलयुग नें अपना असर  दिखाना शुरू कर दिया है....

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

कायाकल्प

कायाकल्प के साथ ही जुड़ा है कुछ नएपन का अहसास इसीलिए शायद छोटा सा भी बदलाव हमें अच्छा लगता है फिर वो किसी भौतिक चीजों का हो या इंसान का....मैंने भी कायाकल्प किया है अपने ब्लॉग का.. सुंदर हरियाली और पेड़-पौधों से घिरे जंगल के बीच रखकर बहुत ही अच्छा लगा...कितने दिनों से मैनें अपने ब्लॉग में कुछ नहीं लिखा...जैसे दुनिया ने मुझसे वक्त छीन लिया हो...या कहूं वक्त होते हुए भी अपने विचारों की उलझन में इतनी खो सी गई हूं लगता है सबसे दूर हो गई...शायद मुझे भी जरूरत है कायाकल्प की या कहूं अब मेरा भी कायाकल्प हो गया है ..कुछ बदला सा महसूस करके सोचती हूं कि ऐसा क्यों हो गया...सोचती पहले भी थी पर उस सोच में संवेदना हावी हो जाती थी.....पर अब लगता है जैसे सारे रिश्तों की कलई उधड़ चुकी है सबका असली चेहरा दिखाई देता है.. तो वितृष्णा होने लगती है फिर सवाल और सवाल और सवाल में उलझ जाती हूं...काम का भी असर पड़ता है जिंदगी में...खबरों के बीच काम करके अब हर बात की सच्चाई दिखाई देती है लोगों के जीने का तरीका लोगों की सोच और तो और रिश्तों को पल-पल बदलते देखकर मैं अपने आपको उस बीच बहुत अकेला सा पाती हूं...आपस में जब किसी विषय पर लोगों से चर्चा होती है तो लोगों के बीच अक्सर कुछ शब्दों का ज्यादा प्रयोग होते देखती हूं तो मैं उनका अर्थ तलाशनें लगती हूं...लोग अक्सर कहते है डिप्लोमैटिक होना सीखिए...प्रेक्टिल बनिए...लाइफ को एंजॉय कीजिए...छोटी-छोटी उम्र में ही लोग कितने परिपक्व हो गए हैं सारी दुनियादारी आ गई है....पर मैं तो इन शब्दों का अर्थ जिंदगी में लगा नहीं पाती और सोचती हूं क्या डिप्लोमेटिक होने से ही सफलता मिलती है, क्या लोगों को अब बनावटी आवरण में लिपटी चीजें ही सुंदर लगती हैं....क्या भीतर से अच्छा होना अयोग्यता हो चुकी है...ये कैसा डिप्लोमैटिक होना हुआ...तभी तो खुशी भी डिप्लोमैटिक मिलती है तो लोग तनावग्रस्त हो जाते हैं...भई जो आप देंगे वही तो मिलेगा ना...सच्ची खुशी तो मन से आएगी और डिप्लोमैटिक होंगे तो मन कहां बचेगा...बात करें प्रेक्टिकल की मैं तो साहित्य की विद्यार्थी हूं मेरे लिए प्रेक्टिकल का मतलब कांच के जार में लैब में होने वाला प्रेक्टिकल...पर ना ना यहां तो अर्थ होता है रिश्तों में प्रेक्टिकल करना...अब बताइए ये कहां से सीखें दुनिया से,....मैट्रो सिटी से या बॉलीवुड से...जहां प्रेम सांसों की गति की रफ्तार से बदलता है ...आज एक से तो कल दूसरे से....मैं कुछ सोच पाऊं तब तक किसी तीसरे से...संवेदना लगाव की बात करें तो पता चलता है प्रेक्टिकल होने का अर्थ...अरे भई किसी के लिए इंसान जीना थोड़ी ही छोड़ता है प्रेक्टिकल बनिए ? पर मैने तो उन लोगों को देखा है, पढ़ा है जो समर्पण की पराकाष्ठा हैं जिन्होंने अपना जीवन मन की शांति के लिए और रिश्तों को निभाने में निकाल दिया...पर अब शायद शांति और खुशी के मायने ही बदल गए हैं ? तभी तो ये शब्द हल्ला मचा रहें हैं और हमारे जैसी सोच वाले लोग आउटडेटेड कहलाते हैं....बस इन्हीं बातों में उलझी मैं कुछ दिनों से मौन हो चुकी थी पर मुझे मालूम है कोई कितना भी डिप्लोमैटिक, प्रेक्टिकल हो या लाइफ को एक पल में एंनजॉय करने वाला हो उसे भी एक वक्त के बाद वही चाहिए जो सच है-सच्ची खुशी,ईमानदार साथी और तकलीफों में साथ देने वाला दोस्त...जो शायद उन्हें कभी नहीं मिल सकता।

बुधवार, 15 सितंबर 2010

ये कैसे डॉक्टर

 अंबिकापुर में एक महिला के पेट में ऑपरेशन के समय एक फीट लंबा कपड़ा छूट गया और तीन महीने के बाद उसे निकाला गया....खबर देख कर उस अंजान महिला के प्रति मेरा मन संवेदना से भर गया.. कि   उसने इन महीनों में कितनी तकलीफ सही होगी...प्रसव के बाद मां बनकर मातृत्व का सुख उठाने की जगह इतने महीने उसने केवल डॉक्टरों के दिए दर्द में ही काट दिए...इन सब बातों से भला उन डॉक्टरों को क्या लेना देना जिन्होंने ऑपरेशन के वक्त लापरवाही की...उन्हें तो मतलब है केवल अपनी फीस से.. यानि ऑपरेशन का पूरा पैसा ....उन्हें तकलीफ तो तब होती जब  फीस पूरी या फिर नहीं मिलती....फिर तो उनकी पांचों ही नहीं छटवीं इंद्री भी जागृत हो जाती...और इसके लिए शायद वो नवजात बच्चे को बंधक बना कर पैसे लाने को मां-बाप को मजबूर कर देते...पर यहां बात उनकी लापरवाही की है तो क्या लगता है इसके लिए उन्हें बंधक बनाया जाए और इस चूक के लिए  कैसे दंडित किया जाए...यही तो मुश्किल है कि डॉक्टरों को लापरवाही की सजा नहीं मिल पाती और वो एक के बाद एक इस तरह की गलती को अंजाम देते रहतें हैं....लगातार इस तरह की घटनाएं हम पढ़ते या देखते रहते हैं पर इन डॉक्टरों पर कार्यवाई की खबर एक बार भी हमें सुनने,पढ़ने को नहीं मिलती...क्या समझें इसे हम कि आम आदमी की जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि कोई भी उसके साथ खिलवाड़ कर सकता है....उनकी परवाह करने के लिए ना शासन है,ना कानून,ना भगवान.....डॉक्टर को भगवान का ओहदा देने वाले लोग अब सोचने पर मजबूर हैं कि अब उन्हें क्या कहा जाए.....सोचिये अगर यही घटना अगर किसी ऊंचे ओहदे वालों के साथ होती तो भी क्या कार्यवाई का स्वरूप यही होता...ये घटनाएं एक साथ कई बातों पर सवालिया निशान लगाती हैं...डॉक्टरी के पेशे पर...शासन के रवैये पर और कानून की कार्यवाई पर....पर ये सवाल हल कौन करेगा ये अपने आप में एक सवाल है...?

सोमवार, 13 सितंबर 2010

अमर प्रेम


आप सोच रहें होगें ये तो फिल्म का नाम है तो मैंने अपने ब्लाग के शीर्षक में क्यूं ले लिया..यही तो लिखना है मुझे आज तो शीर्षक भी यहीहोगा...कल ये फिल्म टीवी पर आ रही थी तो  मैं देखने पर विवश हो गई...बहुत दिनों बाद बहुत अच्छी फिल्म आ रही थी ..फिल्मों का जन्म लोगों के मनोरंजन के लिए हुआ होगा तभी तो लोग बड़ी फुर्सत केसमय देखते हैं पर कुछ फिल्में शायद जीवन की बड़ी गहरी बातों को बड़ी आसानी से लोगों से कह जाती हैं और जीवन के सही मायने बता जाती हैं हां ये बात और है कि लोग कितनी गंभीरता से उसे लेते हैं या महज मनोरंजन कर भुला देते हैं...पर मुझे हमेशा से यही लगता रहा कि फिल्म जीवन का,समाज का आइना होती है उसमें हमें वही देखते हैं जैसे हम हैं इसीलिए तो हर कोई अपने हिसाब की कहें या अपने पसंद की फिल्में देखता है....अमरप्रेम एक ऐसी फिल्म जिसमें हर पात्र जीवन के आदर्श को जीता है...मन की गहराई से उठती संवेदना को जीता है...हर भाव अपने आप में मुक्कमिल...शायद वहां उससे बेहतर किरदार और कलाकार नहीं हो सकता था...प्रेम का परिष्कृत रूप जो अब विरले ही देखने को मिलता है...कौन भला आज के समय में अपने जीवन की खुशी केवल आदर्श निभाने के लिए किसी को देता है....कोइ बचपन में मिले किसी अजनबी के थोड़े से प्यार का कर्ज उतारने  एक अजनबी को अपनी मां का दर्जा देता है..यहां तो लोग अपनी मां को ही घर से बेघर कर देते हैं....किसी से किया वादा लोग जीवन भर तो दूर एक दिन भी नहीं निभाते ऐसे में ये फिल्म देखकर लगता है हम किसी कल्पना की दुनिया में पहुंच गये हैं...पर ऐसा नहीं है आज भी कुछ लोग हैं जो जीवन के आदर्शों के लिए दुख को गले लगाना पसंद करते हैं..ना कि खुशी को हर शर्त पर पाने को लालायित रहते हैं.. ये फिल्म शायद आज के परिप्रेक्ष्य में हमें अजीब लग रहीं हैं क्योंकि अब जीवन के मायने बदल गये हैं, लोगों की जीवन के प्रति सोच बदल गई है...पर आज भी सबको अपने लिए शायद ऐसी ही रिश्तों की गहराई पसंद है....

बुधवार, 8 सितंबर 2010

वो बहुत ख़ूबसूरत है...




बहुत दिनों से मन में ढ़ेर सारी बातें उमड़-घुमड़ रही थी...कितनी सारी घटनाएं आंखों के सामने से होकर मन को उद्वेलित कर निकल गईं... सोचा उन्हें पिरो दूं शब्दों में...पर वही तकिया कलाम मैं भी अपनाकर शायद खुद से बचने की कोशिश की...'वक्त नहीं मिल पाया', काम बहुत था, घर में मेहमान आ गए...पर मैं ये भी जानती हूं कि आप दूसरों से अपनी व्यस्तता की कहानी कहकर काम से बच सकते हैं पर खुद को कहां से जवाब देंगे...पर आज मेरे बहानेबाज़ मन को बहाना बनाने के लिए कोई बहाना नहीं मिला और मैं उतर आई शब्दों की दुनियां में... हर दिन की तरह आज भी जब मैं घर से निकली तो सामने नीले आसमान पर कुदरत की बहुत ही सुंदर चित्रकारी देखकर मन खुश हो गया...पर वही रास्ते..वही भीड़ देखकर...सोच रही थी इतने सारे लोग रोज सफर कर कहां जाते हैं... लगता है जीवन को चलाना ही सबका उद्देश्य है और मुझे लगता है कि ज्यादातर लोगों को ये पता ही नहीं होता कि वे क्यों जिए जा रहें हैं...क्या उद्देश्य है जीवन का ...क्या पाना है और कहां जाना है..कितना कुछ पाना चाहता है हर इंसान शोहरत, पैसा, सुख-सुविधा और न जाने क्या-क्या ख्वाहिशें लेकर दिन की शुरुआत करता है...फिर दिन ढ़लते ही एक थकान भरी उदासी के साथ लौट आता है अपने आशियाने में...इतनी सारी ख्वाहिशों में लोग शायद उसे भूल जाते हैं जो उसके दामन में है... उस खुशी को महसूस करना छोड़ उसकी आस में भटकता रहता है जो या तो उसे मिल नहीं सकता या जो उसकी पहुंच में नहीं है...सड़क पर चलते हुए अक्सर मैनें लोगों को केवल भागते हुए देखा है.... किसी को भी रास्ते पर राहगीर की तरह नहीं देखा...जो रास्ते की खूबियों को कमियों को ..मौसम के रंग को ...हवाओं की छुअन को और आकाश में बादलों की बनती मिटती तस्वीर को पल भर देखकर खुश हुआ हो...पता नहीं जिस कुदरत की छांव में हम रहते हैं उसे देखने का एक पल का भी वक्त क्यों नहीं निकाल पाते...सोचती हूं खुश होने के लिए कितना कुछ है इस जहां में... किसी की मधुर आवाज में सुनाई देता एक प्यारा सा गीत... क्या दिन भर के लिए हमें ऊर्जा से नहीं भर सकता...बादलों में निकलता छुपता चांद क्या अपने आप मुस्कुराने पर विवश नहीं करता... क्या ठंडी हवा की छुअन जीवन के स्पंदन को बढ़ा नहीं देती....इतना कुछ है थोड़ा नजर तो उठाइए ..अपने अंदर महसूस तो करिए ये दुनियां, ये जीवन एक बार ही मिलता है....क्यूं इसे यूं ही बेखयाली में जिए जाते हैं ...

रविवार, 22 अगस्त 2010

एक घूंट प्यास



सोचेंगे अरे ये कैसा शीर्षक? और शायद आप इसे इसलिए पढ़े,  क्योंकि ज़िंदगी में हम उन्हीं चीजों की तरफ बढ़ते हैं जो कहीं न कहीं हमें तृप्त करती है.....पर ये तृप्ति की परिभाषा भी बड़ी कठिन है ....क्योंकि कोई भी कभी तृप्त नहीं होता ...हर बार रह जाती है बाकी      " एक घूंट प्यास"......और यही अधूरी प्यास भटकाती रहती है ज़िंदगी भर और हम उस तृप्ति को तलाशते रहते हैं.....हर किसी की ख्वाहिश अलग, पसंद अलग, चाहत अलग फिर तृप्ति की परिभाषा भी तो अलग होगी ना....अब चातक को देखिए पियेगा तो स्वाति नक्षत्र का ही पानी अरे भई प्यास लगी है तो पी लो ना पानी दुनिया में पानी की कमी थोड़ी है.....पर यही तो बात है, जिस जो चाहिए बस अपने लिए वो उसे ही तलाशेगा...वरना चांद को टकटकी लगाए चकोर यूं ही नहीं ताकता ...पानी गिरने की खुशी में मोर यूं ही नहीं नाचता .....इतनी सुंदर दुनिया में फिर इतने अपराध न होते सब सुकून से अपनी जीवन यात्रा पूरी कर चले जाते वापस उस दुनिया में जहां से आए थे, पर नहीं...ये अतृप्ति कितने और कैसे-कैसे काम करवाती हैं......जो कभी हमारे सोच के दायरे में नहीं था....प्रथा की प्यास अपने बच्चों की जिंदगी से बढ़ जाती है और जन्म देने वालों को तृप्ति मिलती है उन्हें मार कर ....जमीन की प्यास  के लिए अपने खुद बन जाते है बेइमान और अपने ही भाई का हक मार लेते हैं....और उन्हें मिलती है तृप्ति....औरतों को नीचा दिखाने की प्यास में उन्हें सरे आम नंगा कर घुमाया जाता है...जिसे देखकर मिलती है हैवानियत करने वालों को तृप्ति.....झूठे दिखावे की प्यास में इंसान चाहे औरत हो या अदमी...पार कर देता है सारी सीमाएं सही-गलत की और आखिर जब भटकाव की आग में जल जाती है सारी शांति तो कुछ तो लौट जाते हैं ...मन की शांति के लिए सच की दुनियां में पर ज्यादातर लोगों में फिर रह जाती है बाकी ''एक घूंट प्यास''.....

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

जिंदगी की किताब

ब्लॉग में लिखना क्या डायरी में लिखने के समान है मैनें खुद से ही पूछा तो जवाब मिला नहीं ..क्योंकि जब बातें लोगों के सामने हों तो पर्दादारी आ ही जाती है....कोई कितना भी सच्चा हो पर अपनी कलई शायद खुद नही उघाड़ेगा....और कोई दूसरा उघाड़े तो उस पर मानहानी जरूर ठोक देगा फिर भला इस ब्लॉग में लिखने और पढ़ने का क्या औचित्य....यही सोच रही थी सोचा चलो बांट लेती हूं ये भी बात शायद मेरी तरह सोचने वालों की भी एक बिरादरी होगी जो साफगोई पसंद होंगे तो उन्हें भी लगेगा कोई हम जैसा सोचता है.... पहले मैं भी हर दिन तो नहीं पर हां किसी-किसी खास दिन फिर वो चाहे अच्छे अहसास वाले हों या फिर बेहद दुख देने वाले पल उन्हें डायरी के कोरे पन्नों पर चस्पा करके थोड़ी राहत जरूर महसूस करती थी....सालों बाद आज उन्हें पढ़कर बड़ा अच्छा लगता है कि वाकई वो अहसास उस समय के थे .....जिसे न लिखती तो आज दोबारा उन्हें कैसे महसूस कर पाती ....चलिए ये सब तो निजी बातें है ब्लॉग में इनका क्या काम....थोड़ी दुनिया की कहें.....आज मैनें हार्ट सर्जन से इंटरव्यू किया बचपन से ही खास महिलाएं मेरे आकर्षण का केंद्र रहीं....आज जब मैनें उनसे बात की तो उनकी सादगी ने वापस मुझे अपने सादे पन पर गर्वित किया ....कितनी खास पर कितनी आम...जिनकी जिंदगी में बाहरी आडंबर को कोई जगह ही नहीं पूरी तरह समर्पित अपने काम के प्रति ....महिला होके टी.वी. पर सुंदर दिखने का कोई आकर्षण नहीं....लोगों को उनकी बातों से क्या संदेश मिला कैसे लोग दिल की बीमारी के लक्षणों को जानकर अपनी ज़िंदगी को बचा सकें इस पर ही उनका ध्यान था.....जिसने मुझे बहुत दिन पहले पढ़े  शिवानी के उपन्यास की याद दिला दी ....लगा जैसे वो शिवानी के उपन्यास की जीवंत पात्र मेरे सामने बैठी है...उन्होंने कहा कोई भी काम लड़की या लड़कों का नही होता जिसमें योग्यता है वो उस काम के काबिल होता है....हर शर्त पूरी करके आगे बढ़ के यश कमाने वाली महिलाएं कितनी छोटी लग रहीं थी मुझे उनके सामने......आज उनसे मिल कर प्रोग्राम करना केवल अपनी ड्यूटी पूरा करना  नहीं था पर अपने आप को और करीब से जानना था ...उनकी बातों ने मुझे एक बार फिर अपने आप पर नाज करने का मौका दिया .....