शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

आंसू हैं ताकत

 आंसू तेरे नाम.....

तुम कहते हो आंसू का बहना अच्छा होता है..आंसू से मन को ताकत मिलती है...आंसू अगर ना बहें तुम्हारे तो तुम विक्षिप्त हो जाओगे..कितनी विडम्बना है ना ये जिसके लिए आंसू बहते हैं वो ही कहते हैं बहने दो इसे बह जाने दो...वो प्रेम ही क्या जो आंसू के रूप में आखों को सजल ना करे...सुनने में तो बात बड़ी अजीब लगी पर यथार्थ में महसूस किया तो सच मानिए बड़ी खुशी हुई कि आप आत्मा से इतने मासूम हैं कि वो किसी के प्रेम मे विलग होने पर विछोह में रोते हैं..किसी के मिलने पर भी खुशी से आंखे नम होती हैं...यही तो सहजता है जो आज किसी-किसी में ही देखने को मिलती है..और अगर खुद में मिले यकीन मानिए खुशनसीब हैं कि आप सही मायने में इंसान है...जीवन के छोटे-बड़े अनुभव लेते जीवन का एक लंबा वक्त हमने जी लिया...कभी वर्तमान में तो कभी स्मृतियों में...ये भी तुमने ही मुझे समझाया कि हम अपना ज्यादातर जीवन स्मृतियों में जीते हैं तभी शायद अलग होकर भी हम खुश रह पाते हैं,जी पाते हैं..स्मृतियां भी तो कभी वर्तमान थी जिसमे अगर आपने अपना सौ फीसद जिया है तो वो सुखद और संतोषप्रद ही होती है..कोई अफसोस नहीं होता और जब कभी आप खुद के साथ होते हैं तो वही पल आपकी ताकत बन जाते हैं....



मंगलवार, 30 जनवरी 2018

राजिम कुंभ-कल्प 2018

मेरी राजिम यात्रा
राजिम की यात्रा मैने कई बार की और इसकी स्मृतियां मेरे मानस पटल पर सदा के लिए अंकित है..स्कूल कॉलेज में पिकनिक के लिए गए तो राजिम की रौनक कुछ और थी...नौकरी करते वक्त अपने साथियों के साथ पिकनिक में नदियों की सुंदरता ने प्रेम से मन को मोहा..परिवार के साथ पूर्णिमा में राजिम भक्ति के रंग में रंग गया..सालों बाद कल जब राजिम कुंभ पर कार्यक्रम करने के लिए निकली तो राजिम में आस्था के साथ मनोरंजन के अलावा धर्म का राजनीतिकरण दिखा,लोगों की सुविधा के नाम पर भ्रष्टाचार की कलई खोलती परतें दिखीं..नदियों को बचाने के प्रयास के नाम पर नदियों को खत्म करने की बानगी दिखी, ये तो मेरे अपने अनुभव हैं जो साल दर साल बदलते गए...पर राजिम अपने आप में मेरे लिए सदा खास रहा प्रेममय रहा....पढ़ने वालों के लिए भी राजिम को जानना जरूरी है..महानदी,पैरी और सोंढूर नदी के संगम पर बसा है छत्तीसगढ़ का राजिम। पवित्र नदियों के संगम के कारण राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग भी कहा जाता है। यहां हर साल माघ पूर्णिमा से लेकर शिवरात्रि तक विशाल मेला लगता है। संगम के मध्य में कुलेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है । कहा जाता है कि वनवास काल में श्रीराम ने अपने कुलदेवता महादेव जी की पूजा की थी। इस क्षेत्र को कमलक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है..मान्यता है कि भगवान विष्णु ने धरती पर कमल गिराया और कहा कि जहां ये गिरे वहां मेरा मंदिर का निर्माण कराया जाए..और पंखुड़ियों पर शिव के मंदिर स्थापित किए गए इसलिए राजिम से ही पंचकोशी यात्रा भी की जाती है.चकोशी यात्रा में श्रद्धालु पटेश्वर, फिंगेश्वर, ब्रम्हनेश्वर, कोपेश्वर तथा चम्पेश्वर नाथ के पैदल भ्रमण कर दर्शन करते है तथा धुनी रमाते है, १०१ कि॰मी॰ की होती है ये यात्रा। राजिम कुम्भ में विभिन्न जगहों से हजारो साधू-संतो का आगमन होता है, प्रतिवर्ष हजारो की संख्या में नागा साधू, संत आते है, और शाही स्नान तथा संत समागम में भाग लेते है, महाकुम्भ में विभिन्न राज्यों से लाखों की संख्या में लोग आते है,और भगवान श्री राजीव लोचन, तथा श्री कुलेश्वर नाथ महादेव जी के दर्शन करते है, और अपना जीवन धन्य मानते है



रविवार, 28 जनवरी 2018

छत्तीसगढ़ का बीजापुर


लालगढ़ में महिला कमांडो
बहुत दिनों के बाद आज फिर लेखनी की दुनिया में जाने को मन मचल उठा..आज एक बार फिर ब्लॉग के जरिए खुद से और आप सभी से बात करने का मन किया..कितने भी दोस्त हों,कितने भी आपके अपने हों फिर भी आप जितनी बातें अपने आप से करते हैं उतनी शायद किसी से नहीं..चलिए कुछ ऐसा ही वाकया आपसे बांटूं ..एक प्रोग्राम के लिए मुझे छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिला बीजापुर जाने का मौका मिला..नक्सलवाद से आज कोई अनभिज्ञ नहीं है...फिर भी आज हमारी बात इससे इतर है..क्योंकि मुझे यहां मिलना था उन महिला कमांडो से जो इन इलाकों में पोस्टेड हैं...इनकी खूबियां तो मैने आगे लिखी है..पर वो बात जो नहीं लिखी वो ही यहां लिख रही हूं..मॉल,फिल्म और ब्रैंड की दुनिया से दूर ये लड़कियां अपने परिवार के जीवन यापन के लिए इतने चुनौति भरे रास्तों पर चल रहीं हैं जिन्हें देखकर लगता है..कोई आकर देखे तो कैसे हालात हैं सच आपको भी जीने का मकसद जरुर मिलेगा..चलिए अब इनकी खूबियां बताऊं..
लालगढ़ में महिलाओं की धमक, आतंक के खौफ को मात...नक्सल इलाकों में विकास की कमान सम्हालती ...ये हैं बीजापुर की महिला कमांडो...जिन्होंने ली है इन हालातों से निपटने की खास ट्रेनिग और ट्रेनिग पूरी कर ये उतर चुकी हैं जमीनी जंग के लिए...नदी पार करना हो ..जंगली जानवरों से निपटना हो या फिर विकास के कार्य की जिम्मेदारी हो..हर चुनौती के लिए सजग चौकस और मुस्तैद...इन महिला कमांडो को विस्फोटक, IED, बारूदी सुरंग, आरओपी, एमसीपी, कांबिंग गश्त, एरिया डॉमिनेशन, सिविक एक्शन, एंबुश, मैप रीडिंग, GPS से लेकर बलवा तक से निपटने में महारत हासिल है.महिला कमांडो के फील्ड पर आने से नक्सली चुनौतियों को निपटने में भी मदद मिल रही है..अपनी इन्ही खूबियों और समर्पण से ये आज दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बनकर उभर रही हैं.छ
त्तीसगढ़ की इन महिला कमांडो को हम सलाम करते हैं....ज्योति सिंह

स्वयंसिद्धा सोनल मिश्रा


 लड़कियों के लिए मिसाल


माता-पिता जब बेटी के जन्म को अपने जीवन का पुण्यफल समझें तो... सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं उस लड़की की काबिलियत का.. और ये कहना है सोनल मिश्रा की मां का...स्वभाव से सरल.. इरादे से बुलंद... चुनौतीपूर्ण पुलिस का करियर ये पहचान है सोनल मिश्रा की... आईपीएस सोनल मिश्रा वर्तमान में प्रशासन छत्तीसगढ़ पुलिस में डीआईजी हैं... मां की प्रेरणा, अच्छी परवरिश .. ईमानदार कोशिश और कुछ कर गुजरने के जज्बे ने सोनल को इस मुकाम तक पहुंचा दिया है... 15 फरवरी 1974 को जन्मी सोनल 2000 में आईपीएस अधिकारी बनीं..शुरुआती पढ़ाई रायपुर से हुई उसके बाद अलग-अलग जगहों पर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की.. इलेक्ट्रॉनिक्स से इंजीनियरिंग करने के बाद सोनल ने आईआईटी कानपुर से एम टेक किया और 1999 में IES में सेलेक्ट हो गईं...और रेलवे ज्वाइन किया .. पर सोनल लोगों के लिए कुछ करना चाहती थीं.. तो उन्होंने फिर से UPSC की परीक्षा दी.. और 33वां रैंक हासिल कर ..बन गईं आईपीएस अधिकारी...10 महीने की कड़ी ट्रेनिंग के बाद उनकी पहली पोस्टिंग एएसपी के तौर पर तमिलनाडु के त्रिचि जिले में हुई... पुलिस के रोमांचक और चुनौतीपूर्ण करियर के 15 सालों के बाद आज सोनल रायपुर में डीआईजी के तौर पर अपनी सेवाएं दे रही हैं...पुलिस को सोनल ऐसा क्षेत्र मानती हैं.. जिसके जरिए वो लोगों की रक्षा और न्याय के लिए लड़ सकती हैं... बचपन से ही पढ़ाई में तेज सोनल को महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए लिखना भी बेहद पसंद है.. इसके अलावा सोनल ने लक्षद्वीप में स्कूबा डायविंग की है.. तो ऑस्ट्रेलिया में स्काई डायविंग... हिमालय में ट्रैकिंग का अनुभव भी सोनल के साथ है.. वे दो बच्चों की मां हैं.. और सफल दांपत्य जीवन के साथ अपने चुनौतीपूर्ण करियर की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं....

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

धुंआं -धुंआ जिंदगी

फिल्मों और धारावाहिक के दौरान धूम्रपान और शराब के सीन आने पर लिखा होता है ...धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है इससे कैंसर हो सकता है । शराब, सिगरेट और गुटखा के पैकेट पर भी चेतावनी लिखी होती है। केंद्र और राज्य सरकार भी इसकी पांबदी और इससे बचने के लिए हर तरह के प्रचार-प्रसार, विज्ञापन पर लाखों खर्च कर रही है। ......पर ये तो वही कहावत हुई शायद आपने भी सुनी हो....चोर से कहना चोरी कर..और साहूकार से कहना जागते रहे.....पहली बात.... लोग खुद इसके सदियों से आदि हो चुके हैं वो इसके नशे से बचना नहीं चाहते या बच नहीं सकते....दूसरी बात बिक्री से होने वाला फायदा आर्थिक स्तर पर बड़ी भूमिका अदा करता है.....तो फिर रुके कैसे...सीधी सी बात है इसका उत्पादन बंद कर दें....ना उत्पादन होगा ना बिक्री होगी..ना बीमारी होगी...या फिर लोग इसको त्याग दें....ना लोग खाएंगे ...ना बिक्री होगी ना उत्पादन होगा....पर ये दोनो ही बातें नहीं होंगी.....हम अपनी मेहनत की कमाई से नशे की चीजें खरीदेंगे..खाएंगे और फिर बीमार होकर डॉक्टर को फीस देंगे और दवाई के लिए मोटी रकम भी खर्च करेंगे और तकलीफ भी उठाएंगे...कितना बेबस और कमजोर होता है इंसान ....कभी मौका मिले तो देखिएगा शराब की दुकानों पर कितनी शिद्दत से ध्यान लगाए बोतल का इंतजार करते हैं। सिगरेट के लहराते धुएं में कितनी तल्लीनता से अपने गमों को उड़ाते हैं बिचारे...और गुटखा मुंह में भरकर शायद बुरा बोलने से बचने की कोशिश करते हैं....पूछो तो कहते है अरे पियो तो जानो ....कितना सुकून है इसमें...पर मुझे हमेशा से यही बात सालती है कि कोई भी नशा क्या जीवन के नशे से बड़ा हो सकता है...या फिर कोई कैसे जानबूझ कर कोई ऐसी चीज खा पी सकता है जो शरीर में जाकर नुकसान पहुंचाता है....प्रकृति में इतनी अच्छी और स्वादिष्ट चीजें है जो एक जीवन में हम पूरी तरह खा भी नहीं पाते फिर इसकी जरूरत क्यों पड़ती है....थोड़ा सा सोचिए...जिंदगी बेहद कीमती है इसकी अहमियत जाननी हो तो एक बार अस्पताल जाकर जरूर देखें शरीर में बीमारी हो तो कितनी तकलीफ मिलती है खुद को भी और अपने अपनों को भी तो फिर क्यों ये राह चुने जिसका अंत बुरा है.....

मंगलवार, 26 जून 2012

दिल्ली की दुनिया

दिल्ली का सफर तो कई बार किया। कभी कहीं आते-जाते दिल्ली को पार करती ट्रेन से दिल्ली को बड़ी कौतूहल से देखा भी। हर बार एक आश्चर्य और बड़ेपन के अहसास से मन भर जाता था। दिल्ली में रहने वाले लोग छोटे शहरों के लोगों के लिए किसी दूसरी दुनिया में रहने वाले जैसे होते हैं। भारत की राजधानी दिल्ली जिसका सदियों का गौरवशाली इतिहास है,तो तेजी से बढ़ते मैट्रो कल्चर की हर आधुनिक बातों से लबरेज है। दिल्ली का आकर्षण मुंबई, कोलकाता और चेन्नई से हट के है। बुद्धिजीवी वर्ग, पढ़ाई का माहौल, कला की बानगी तो राजनीति का गढ़ दिल्ली सभी के लिए आकाश के सितारे जैसा है जिसे शायद हर कोई पाना चाहता है।आगे बढ़ने की चाह जिसमे हो वो एक बार जरूर दिल्ली की गति के साथ कदम ताल जरूर मिलाना चाहेगा। बस यही चाह मौका मिलते ही दिल्ली के लिए मेरा भी मन में मचल उठा। मन में आत्मविश्वास लिए पहुंच गई दिल्ली। दिल्ली को अपनाने की जद्दोजहद में दिल्ली को करीब से देखने का मौका मिला। साफ-सुथरी चमचमाती सड़के, सड़कों के ऊपर दौड़ती मेट्रो,रंग-बिरंगी बसें और ऐतिहासिक ईमारतों की गरिमा आपको खास होने का अहसास कराती हैं। यहां लोगों के पास किसी के लिए कोई वक्त नहीं, मेल जोल बढ़ाने का कोई रिवाज नहीं, काम निकालने के अलावा दूसरा कोई मकसद नहीं किसी से जुड़ने का। हर कोई जैसे दूसरी जगह से आने वाले लोगों को कमतरी का अहसास कराने में जुटा है। किसी पे आपने यकीन करने की गलती की तो आपके साथ क्या होगा आप खुद नहीं जानते। ऐसी भूल-भुलैया दिल्ली में अगर आपमे जज्बा नहीं, जूझने की हिम्मत नहीं तो कब आप खो जाएंगे कोई नहीं  जानता। दिल्ली के बाहर से यहां आकर पढ़ने वाले, काम करने वाले लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। खासकर युवा वर्ग इसे करियर के लिहाज से ज्यादा पसंद करता है। उच्च शिक्षा हो, कोचिंग हो या नौकरी की चाह में युवा खिंचे चले आते हैं। तो यहां हर बात को प्रोफेशनल का जामा पहना कर लूटने वालों की कमी भी नहीं है। पेइंग गेस्ट का कारोबार शायद आईपीएस बनने से ज्यादा फायदेमंद है। हर घर में खुद के लिए जगह कम हो तो चलेगा पर एक कमरा भी है तो आप उससे बेहद कमा सकते हैं। कुछ भी खाना बना दें उसकी कई गुनी कीमत आप कमा सकते हैं। और हां अगर आप संवेदना, सादगी, अपनापन,ईमानदारी जैसी खूबियां रखते हैं तो इसे आप छुपा लें वरना आउटडेटेड कहलाने का खतरा भी यहां है। यहां तो भई जो दिखता है वो बिकता है की परंपरा है अगर आपने बाहरी सजावट अच्छी की है,अंग्रेजी के बोल आपके होठों पर सजे हैं, सामने वाले को बेवकूफ बनाने की कला जानते हैं तभी आप दिल्ली की तरफ उम्मीद से देखें वरना ये दिल्ली आपका दिल निकाल कर आपको बेदिल और बेदखल करने के लिए तैयार है। सोच समझ कर चलें दिल्ली की राह.. ये राह आसान नहीं...गालिब ने शेर मोहब्बत की जगह दिल्ली पर लिखा होता तो शायद सही होता......ये दिल्ली नहीं आसां बस इतना समझ लीजे,इक आग का दरिया है और डूब के जाना है....

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

धमाके में जिंदगी
फिर धमाका हुआ  , अफरा-तफरी मची
लोगों की भीड़ जुटी, हल्ला मचा
सारे टीवी स्क्रिन ब्रेकिंग प्वाइंट से भर गए
लोग देखने, सुनने के लिए बेताब होगए
थोड़ी देर में घटना स्थल की तस्वीरें आगईं
और सभी की जुबान पर हाय..हाय के शब्द तैर गए.....
पर संवेदना कितनी थी ये तो पता नहीं
क्योंकि लोग एक पल ठहर कर चल पड़े आगे ....जैसे ट्रेन के छूटते ही प्लेटफार्म छूट जाता है....एक दिन पहले ट्रेन हादसे में जाने गईं ...मलबा हटा नहीं और दूसरी जगह धमाके में ढ़ेर हो गए लोग।
हिन्दी फिल्मों की तरह ही सब खत्म होने के बाद पहुंची पुलिस
कुछ नेताओं नें घटना स्थल का दौरा करके जिम्मेदारी निभाई 
 और सुरक्षा पर कसीदे भी कढ़े...
और पुलिस जांच में जुटी कह कर हादसे की कहानी समाप्त...
ये है हिंदुस्तान जिसे फिरंगियों से छुड़ाने के लिए
लोगों नें अपनी जाने दी..वो जिंदा होते तो जरूर शर्माते,
अब तो देश को लूटने और बरबाद करने वालों की फौज तैयार है
इसीलिए संवेदना भी किराए की हो गई है...
हर दिन हादसे होते हैं, लोग मरते हैं,
कभी नक्सलवादी, कभी आतंकवादी
कभी भ्रस्टाचार के खिलाफ अनशन में तो,
कभी लापरवाही की भेंट चढ़ रहे हैं लोग..
होना कुछ नहीं है, वही ढाक के तीन पात...
लोग खुद आदि हो चुके हैं जंगलराज के
उन्हें मालूम है ये भारत है यहां
ना न्याय मिलना है ना सजा,
क्योंकि गरीब लोग ही मरते हैं
जब तक कसाब जैसे लोग देश में पलेंगें
तो उनके जन्मदिन में धमाके के केट कटेंगे ही
न्याय तो तब मिलेगा जब कोई
कोई कद्दावर आहत होगा ...
उसकी भी गारंटी नहीं है...
न्याय मिलेगा या जेल में पलेगा ?

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

ये कैसा प्यार ?

                                                                                                          
कुछ बातों पर यकीन करना चाहूं तो भी नहीं कर पाती...कुछ लोगों के बदलाव को देखूं तो भी यकीन नहीं होता...सोचती हूं क्या वाकई दुनिया बदल गई...क्या रिश्तों के मायने अब नया रूप अख्तियार कर चुके हैं...अब तक बॉलीवुड और टीवी सीरियल में इस तरह की स्टोरी देखकर लगता था कि क्या ऐसा दुनिया में होता होगा...फिर सोचा ग्लैमरस लाइफ के लिए ये बात मायने नहीं रखती लोग कपड़ों की तरह रिश्ते बदलते है...और टीवी सीरियल में तो लोगों के मनोरंजन या टीआरपी के चक्कर में काल्पनिक तौर पर बनाया जाता होगा ...पर अब तो अपने आस-पास के लोगों को देखकर लगता है कि वाकई फिल्म वालों को भी स्टोरी हमारे बीच के लोग ही देतें हैं...आज 'प्यार' शब्द पर ही बात कर लें क्योंकि सारे रिश्ते और शब्दों पर बात करें तो उलझ सी जायेंगी...'प्यार' ये शब्द सुनते ही मन एक सुंदर सी भावना के आसपास घूमने लगता है...जिसमें त्याग, समर्पण, ईमानदारी जैसे भावों का समावेश हुआ करता था...प्यार का नाम सुनते ही याद आते थे वो कुछ लोग जो जाति-धर्म,ऊंच-नीच,अमीरी-गरीबी से परे एक दूसरे की परवाह के लिए अपनी जान तक दे चुके हैं...शायद सब जानते हैं हीर-रांझा,शीरी-फरहाद,लैला-मजनू को...पर आज के प्रेमी शायद इनकों बेवकूफ कहें तो चौंकियेगा मत...क्योंकि अब तो लोग प्यार को जीत-हार और जिंदगी के लिए सुख बटोरने का माध्यम बना चुके हैं,हीर ना मिली तो क्या दुनिया में हीर की कमी है ,रांझा न मिला तो क्या.. अरे उससे अच्छा रांझा भी आस-पास ही मिल जाएगा...रही बात कसमे-वादे की जो साथ निभाने के लिए हर प्रेमी एक दूसरे से करते हैं..साथ में सारी हदे फिर वो चाहे मन की हो या तन की पार करने के बाद भी उसे सामान्य करार देकर आगे निकल पड़ते हैं... जैसे वो किसी नाटक के संवाद से ज्यादा कुछ भी नहीं था..जो एक नाटक खत्म होने के साथ ही खत्म हो जाता है....और जिंदगी में नए प्रेमी-प्रेमिका के बदलते ही बदल जाता हैं...इतना तो फिर भी ठीक है साहब पर आज तो एक साथ कई लोगों से प्यार निभाते देखा जाता है और फिर जो बेहतर मिलता है अपनी जरूरतों के हिसाब से उसे बड़े नाटकीय अंदाज में जीवन साथी भी चुन लिय़ा जाता है...तमाम पाकिजगी और आंखों में शर्मों हया की दुहाई के साथ...और ना तो प्रेमी को फर्क पड़ता है धोखा देने का ना ही प्रेमिका को फर्क पड़ता नए के साथ हो लेने का...क्या कहिएगा इसे बॉलीबुड की फिल्मी स्टोरी..जी नहीं ये हकीकत है आज के समय की.. जिसकी झलक अब छोटे-बड़े शहरों में आसानी से देखी जा सकती है...आज के समय में रिश्तोंकी गरिमा,गंभीरता,ईमानदारी,संघर्ष की बात करिए तो जो युवा आपके पास होंगे वो जरूर आपको पुराने जमाने का कह कर आपको आउटडेटेड कहने से नहीं चूकेंगे...और आपको खुद शर्म आएगी अपनी सादगी और ईमानदारी पर....और मुश्किल तो यही है कि सुख की परिभाषा भी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती देख पाएंगे आप..मेरी सोच में तो ये प्यार नहीं आप क्या सोचते हैं इस बारे में.....ये बदलाव कहां ले जाएगा दुनिया को....रिश्तों कों...या अब यही पहचान होगी रिश्तों की जिससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा...झूठ ,फरेब,चापलूसी.धोखा,जीत हार का गणित,भ्रस्ट आचरण,छल-कपट ही शायद इस युग की पहचान मानी जायेगी..क्योंकि हर युग की अपनी विशेषता होती है ,लोगों के जीवन मूल्य,नैतिक मूल्य होते हैं..तो यही समझें कि वाकई कलयुग नें अपना असर  दिखाना शुरू कर दिया है....

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

कायाकल्प

कायाकल्प के साथ ही जुड़ा है कुछ नएपन का अहसास इसीलिए शायद छोटा सा भी बदलाव हमें अच्छा लगता है फिर वो किसी भौतिक चीजों का हो या इंसान का....मैंने भी कायाकल्प किया है अपने ब्लॉग का.. सुंदर हरियाली और पेड़-पौधों से घिरे जंगल के बीच रखकर बहुत ही अच्छा लगा...कितने दिनों से मैनें अपने ब्लॉग में कुछ नहीं लिखा...जैसे दुनिया ने मुझसे वक्त छीन लिया हो...या कहूं वक्त होते हुए भी अपने विचारों की उलझन में इतनी खो सी गई हूं लगता है सबसे दूर हो गई...शायद मुझे भी जरूरत है कायाकल्प की या कहूं अब मेरा भी कायाकल्प हो गया है ..कुछ बदला सा महसूस करके सोचती हूं कि ऐसा क्यों हो गया...सोचती पहले भी थी पर उस सोच में संवेदना हावी हो जाती थी.....पर अब लगता है जैसे सारे रिश्तों की कलई उधड़ चुकी है सबका असली चेहरा दिखाई देता है.. तो वितृष्णा होने लगती है फिर सवाल और सवाल और सवाल में उलझ जाती हूं...काम का भी असर पड़ता है जिंदगी में...खबरों के बीच काम करके अब हर बात की सच्चाई दिखाई देती है लोगों के जीने का तरीका लोगों की सोच और तो और रिश्तों को पल-पल बदलते देखकर मैं अपने आपको उस बीच बहुत अकेला सा पाती हूं...आपस में जब किसी विषय पर लोगों से चर्चा होती है तो लोगों के बीच अक्सर कुछ शब्दों का ज्यादा प्रयोग होते देखती हूं तो मैं उनका अर्थ तलाशनें लगती हूं...लोग अक्सर कहते है डिप्लोमैटिक होना सीखिए...प्रेक्टिल बनिए...लाइफ को एंजॉय कीजिए...छोटी-छोटी उम्र में ही लोग कितने परिपक्व हो गए हैं सारी दुनियादारी आ गई है....पर मैं तो इन शब्दों का अर्थ जिंदगी में लगा नहीं पाती और सोचती हूं क्या डिप्लोमेटिक होने से ही सफलता मिलती है, क्या लोगों को अब बनावटी आवरण में लिपटी चीजें ही सुंदर लगती हैं....क्या भीतर से अच्छा होना अयोग्यता हो चुकी है...ये कैसा डिप्लोमैटिक होना हुआ...तभी तो खुशी भी डिप्लोमैटिक मिलती है तो लोग तनावग्रस्त हो जाते हैं...भई जो आप देंगे वही तो मिलेगा ना...सच्ची खुशी तो मन से आएगी और डिप्लोमैटिक होंगे तो मन कहां बचेगा...बात करें प्रेक्टिकल की मैं तो साहित्य की विद्यार्थी हूं मेरे लिए प्रेक्टिकल का मतलब कांच के जार में लैब में होने वाला प्रेक्टिकल...पर ना ना यहां तो अर्थ होता है रिश्तों में प्रेक्टिकल करना...अब बताइए ये कहां से सीखें दुनिया से,....मैट्रो सिटी से या बॉलीवुड से...जहां प्रेम सांसों की गति की रफ्तार से बदलता है ...आज एक से तो कल दूसरे से....मैं कुछ सोच पाऊं तब तक किसी तीसरे से...संवेदना लगाव की बात करें तो पता चलता है प्रेक्टिकल होने का अर्थ...अरे भई किसी के लिए इंसान जीना थोड़ी ही छोड़ता है प्रेक्टिकल बनिए ? पर मैने तो उन लोगों को देखा है, पढ़ा है जो समर्पण की पराकाष्ठा हैं जिन्होंने अपना जीवन मन की शांति के लिए और रिश्तों को निभाने में निकाल दिया...पर अब शायद शांति और खुशी के मायने ही बदल गए हैं ? तभी तो ये शब्द हल्ला मचा रहें हैं और हमारे जैसी सोच वाले लोग आउटडेटेड कहलाते हैं....बस इन्हीं बातों में उलझी मैं कुछ दिनों से मौन हो चुकी थी पर मुझे मालूम है कोई कितना भी डिप्लोमैटिक, प्रेक्टिकल हो या लाइफ को एक पल में एंनजॉय करने वाला हो उसे भी एक वक्त के बाद वही चाहिए जो सच है-सच्ची खुशी,ईमानदार साथी और तकलीफों में साथ देने वाला दोस्त...जो शायद उन्हें कभी नहीं मिल सकता।

बुधवार, 15 सितंबर 2010

ये कैसे डॉक्टर

 अंबिकापुर में एक महिला के पेट में ऑपरेशन के समय एक फीट लंबा कपड़ा छूट गया और तीन महीने के बाद उसे निकाला गया....खबर देख कर उस अंजान महिला के प्रति मेरा मन संवेदना से भर गया.. कि   उसने इन महीनों में कितनी तकलीफ सही होगी...प्रसव के बाद मां बनकर मातृत्व का सुख उठाने की जगह इतने महीने उसने केवल डॉक्टरों के दिए दर्द में ही काट दिए...इन सब बातों से भला उन डॉक्टरों को क्या लेना देना जिन्होंने ऑपरेशन के वक्त लापरवाही की...उन्हें तो मतलब है केवल अपनी फीस से.. यानि ऑपरेशन का पूरा पैसा ....उन्हें तकलीफ तो तब होती जब  फीस पूरी या फिर नहीं मिलती....फिर तो उनकी पांचों ही नहीं छटवीं इंद्री भी जागृत हो जाती...और इसके लिए शायद वो नवजात बच्चे को बंधक बना कर पैसे लाने को मां-बाप को मजबूर कर देते...पर यहां बात उनकी लापरवाही की है तो क्या लगता है इसके लिए उन्हें बंधक बनाया जाए और इस चूक के लिए  कैसे दंडित किया जाए...यही तो मुश्किल है कि डॉक्टरों को लापरवाही की सजा नहीं मिल पाती और वो एक के बाद एक इस तरह की गलती को अंजाम देते रहतें हैं....लगातार इस तरह की घटनाएं हम पढ़ते या देखते रहते हैं पर इन डॉक्टरों पर कार्यवाई की खबर एक बार भी हमें सुनने,पढ़ने को नहीं मिलती...क्या समझें इसे हम कि आम आदमी की जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि कोई भी उसके साथ खिलवाड़ कर सकता है....उनकी परवाह करने के लिए ना शासन है,ना कानून,ना भगवान.....डॉक्टर को भगवान का ओहदा देने वाले लोग अब सोचने पर मजबूर हैं कि अब उन्हें क्या कहा जाए.....सोचिये अगर यही घटना अगर किसी ऊंचे ओहदे वालों के साथ होती तो भी क्या कार्यवाई का स्वरूप यही होता...ये घटनाएं एक साथ कई बातों पर सवालिया निशान लगाती हैं...डॉक्टरी के पेशे पर...शासन के रवैये पर और कानून की कार्यवाई पर....पर ये सवाल हल कौन करेगा ये अपने आप में एक सवाल है...?